class 10 NCERT Solutions Hindi kritika chapter 1 माँ का आँचल

माँ का आँचल

1. बच्चे विपदा के समय माँ की शरण क्यों लेते हैं?
माँ और बच्चे का रिश्ता जन्मजात ममता और विश्वास पर टिका होता है। बच्चा जब डरता या दुखी होता है, उसे सबसे अधिक वात्सल्य, सुरक्षा और शांति माँ से ही मिलती है। पिता का रिश्ता स्नेह और अनुशासन का अधिक होता है, लेकिन माँ संपूर्ण समर्पण, करुणा और स्नेह का प्रतीक होती है। विपदा के समय बच्चा माँ के आँचल में खुद को सुरक्षित और निडर अनुभव करता है। माँ का दुलार और स्पर्श हर दुख को हर लेता है। भोलानाथ भी अपने पिता का दुलारा था, दोनों में गहरा प्रेम था, लेकिन डर और दुःख के क्षण में जो आत्मिक शांति उसे माँ की बाहों में मिली, वह कहीं और नहीं मिल सकती थी। यही कारण है कि कोई भी बच्चा सबसे पहले माँ की शरण लेना पसंद करता है।

2. भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना क्यों भूल जाता है?
बच्चों का स्वभाव क्षणभंगुर होता है—वे जल्दी दुखी होते हैं तो जल्दी प्रसन्न भी। भोलानाथ भय, तकलीफ या उदासी के बाद जब अपने साथियों को खेलता-कूदता देखता है, तो उसका ध्यान उनके उल्लास में रम जाता है। बच्चों की संगति, खेल और मस्ती में वह अपने डर या रोने की वजह भूल जाता है। उनकी नज़रों में खेल या मित्रता अधिक महत्वपूर्ण और आकर्षक होती है—यही कारण है कि वह सिसकना भूल जाता है और फिर से हँसने-खेलने में लग जाता है। यह सहज और स्वाभाविक बचपन की मौलिकता है।

4. भोलानाथ और साथियों के खेल/खिलौने आज के बच्चों से कैसे भिन्न हैं?
भोलानाथ और उसके साथी खेत, आँगन, वृक्षों के नीचे खेलते थे। उनकी खेलने की सामग्री मिट्टी, पत्थर, गीली मिट्टी, पेड़ की पत्तियाँ या फल, घर के टूटे बर्तन होती थी। कोई बड़ा सामान नहीं—सारा खेल प्रकृति और सरल संसाधनों से होता था। आज के बच्चों के लिए खेल सामग्री बाजार से खरीदी जाती है—क्रिकेट बैट, वीडियो गेम, कार-बाइक, लूडो, कंप्यूटर, मोबाइल। अब खेल बाहरी साधनों पर निर्भर हैं, जबकि पहले खेल बच्चों की कल्पना, सरलता और आसपास की चीज़ों के सहज उपयोग से जन्म लेते थे। पुराने खेल बिना पैसे के, नए खेल महंगे व कृत्रिम साधनों पर टिके हैं।

5. पाठ के भावपूर्ण प्रसंग
मुझे तीन प्रसंग बेहद छुए:

  1. जब भोलानाथ अपने पिता की गोद में बैठा आइने में खुद को देखकर हँसता है, और पिता के देखने पर शर्माकर मुस्कुरा देता है—यह निश्छलता और आत्म-अभिव्यक्ति भावपूर्ण है।
  2. बच्चों द्वारा बारात और दुल्हन का खेल, जिसमें मासूमियत और नाटकीयता दोनों झलकती है।
  3. पिता के साथ कुश्ती लड़ना—जहाँ पिता हारकर भी बच्चे के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं—उनकी साझी हँसी, खींचातानी गहरे भाव स्पर्श देती है।

6. तीस के दशक की ग्राम्य संस्कृति और आज का गांव कैसे भिन्न है?
तीस के दशक में गांव आज के मुकाबले ज्यादा सरल, स्वाभाविक, मेलजोल से भरे और सामूहिक जीवन के केंद्र थे। पर्व-त्योहार मिल-जुलकर मनाए जाते, बच्चों को खेल-खेल में ही जीवन की शिक्षा दी जाती थी। आज गांव शहरीकरण, राजनीति, जाति-पांति, सुविधा, स्कूल, सड़क, बिजली, वैज्ञानिक खेती के कारण बदल चुके हैं। मेलजोल कम हुआ है, वर्गभेद बढ़ा है, रिश्तों में औपचारिकता, सुविधा और भौतिकता घुस आई है।

8. मातापिता का बच्चों के प्रति वात्सल्य
पिता अपने बेटे के साथ सुबह से शाम तक समय बिताते, उसे सुलाते, नहलाते, पढ़ाते, खेलते, पेट के साथ मछलियों को चारा खिलाना—ये सब अतिशय स्नेह के चिह्न हैं। माँ खिलाने के लिए कई स्वांग रचती, उसकी हर जरूरत, डर, दर्द में साथ होती है, दुख देखकर खुद रो पड़ती है, बच्चे की पीड़ा से खुद भी व्याकुल हो जाती है—यह बताता है कि वात्सल्य दोनों माता-पिता में अद्भुत होता है।

9. ‘माता का आँचलशीर्षक की उपयुक्तता तथा वैकल्पिक शीर्षक
यह शीर्षक बहुत सार्थक है—माँ का आँचल बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित, स्नेहिल स्थान है। किसी भी विपदा, दर्द, डर में बच्चा माँ के आँचल को शरण मानता है, वहीं उसे तसल्ली मिलती है—कहानी इसी भाव को केंद्रित करती है। विकल्प चिंतन करें तो: ‘माँ की ममता’, ‘माँ का साया’, ‘वात्सल्य का संसार’ या ‘माँ का प्यार’ उपयुक्त हो सकते हैं।

10. बच्चे अभिभावकों से प्रेम कैसे दिखाते हैं?
बच्चे गोद में बैठकर, पीठ पर बैठकर, माँ को छोटी-छोटी बात बताते, कभी रोकर अपनी जिद पूरी करवाते, शाम को बाहर ले जाने को कहते, अपनी समस्याएँ सुनाते, अपने दोस्तों या स्कूल की बातें साझा कर, प्यारी शरारतों या तोहफों के साथ अपने स्नेह का इज़हार करते हैं।

11. बच्चों की यह दुनिया आपके बचपन से कैसी भिन्न है?
पाठ में बच्चे मिट्टी, बर्तन, खेत, पेड़, नदी, गाँव की खुली प्रकृति में खेलते हैं, उनकी दुनिया साधनों से नहीं अनुभव, कल्पना से भरी है। आज के बच्चों के लिए बाहर खेलना दुर्लभ हो गया है; इंटरनेट, मोबाइल, वीडियो गेम, टीवी, शहरों के छोटे फ्लैट, कृत्रिम बस्तियाँ उनकी दुनिया बन गई हैं। पुराने बचपन की सादगी और सामूहिकता अब किताबों में या कहानियों में सीमित रह गई है।

chapter-1-माँ-का-आँचल

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *